Skip to main content

Posts

मन रूपी हाथी को काबू करने के लिए विवेक रूपी अंकुश जरूरी है ।

मन मतंग गइयर हने, मनसा भई सचान । जंत्र मंत्र माने नहीं, लागी उड़ि उड़ि खान ।। ( मतंग - हाथी, गइयर- महावत, हने- मारता है, मनसा- इच्छाएं, सचान- बाज पक्षी) मन उन्मत्त हाथी के समान है यह जीव रूपी महावत को मारता रहता है । और इच्छाएं बाज पक्षी के समान हैं जो उड़ उड़कर जीवों को खाता रहता है । जीव अविनाशी चेतन है और मन एक आभ्यासिक वृति मात्र है । परन्तु जीव अपने स्वरूप को भूल कर दीन बन गया है और उसकी बनाई वृति ही उसपर सवार हो गयी है । महावत हाथी पर सवार होकर अंकुश से उसे काबू में रखता है, परन्तु जब हाथी उन्मत्त हो जाए तोह तोह वह महावत को गिराकर मार देता है । हाथी एक शक्तिशाली देह वाला है इसलिए वह महावत को मार सकता है, परन्तु मन कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं जो बलपूवर्क जीव को मार दे । मन तोह इसलिए जीव को परेशान करता है क्योंकि जीव अपना स्वरूप भूल कर विषयों का गुलाम बना रहता है । यदि जीव अपने स्वरूप को जान ले और अपने आप में स्थित हो जाए तोह मन उसका गुलाम हो जाएगा । जिसको स्वरूप ज्ञान हो जाता है वह इच्छाओं को छोड़ देता है और मन उसके अधीन हो जाता है । कबीर साहिब ने मन और उसकी इच्छाओं के उन्मत्त ...

सत, रज व तम तीनों गुणों पर विजय प्राप्त करो ।

तामस केरे तीन गुण, भँवर लेइ तहां बास । एकै डाली तीन फल, भाँटा ऊख कपास ।। तामस कहते हैं अंधकार को माया को । कबीर साहिब कहते हैं कि सत, रज और तम तीनों गुण माया के पेट में हैं । अर्थात एक माया की डाली पर यह तीन फल लगते हैं जो एक दूसरे के परस्पर विरोधी हैं । आप किसी एक शाखा पर भांटा, ऊख व कपास को लगा देखोगे तोह आश्चर्य ही होगा । माया और प्रकृति की डाली में यही बात है, इसमें परस्पर विरोधी तीन गुण एक साथ रहकर सृष्टि का संचालन करते हैं । आप जानते ही हैं तेल, बत्ती और आग तीनों परस्पर विरोधी होते हैं पर तीनों के मिलने से ही प्रकाश उत्पन्न होता है । इसी तरह सत, रज, और तम भी एक दूसरे के परस्पर विरोधी होते हुए भी संसार के कार्यों का संपादन करते हैं । साहिब कहते हैं कि जीव का मन भंवरा इसी त्रिगुणात्मक जगत के पदार्थों में गन्ध लेता रहता है । यह ठीक है कि सत, रज और तम तीनों गुणों के अलग अलग परिणाम हैं, पर है सभी क्षणिक । गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि सतोगुण उच्च गति को, रजोगुण मध्यम गति को और तमोगुण निम्न गति को ले जाते हैं । इसी लिए श्री कृष्ण अर्जुन को इन तीनों गुणों से अलग होकर सभी द्व...

ब्राह्मण कौन है और चमार कौन है ?

बड़े गये बड़ापने, रोम रोम हंकार । सतगुरू के परचै बिना, चारो वरण चमार ।। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि कि भौतिक पदार्थों का अहंकार करना । धन, विद्या, जाति, शरीर, जवानी, सौंदर्य आदि भौतिक पदार्थों में मनुष्य इतना डूबा हुआ रहता है कि इन क्षणिक वस्तुओं को लेकर इतराता रहता है । सारे अहंकार की जड़ शरीर है और इसके गलते तथा विनशते देर नहीं लगती । तोह मनुष्य किस चीज़ का अहंकार करता है । शरीर के छूटते ही सभी वस्तुओं से नाता छूट जाता है । फिर उसका क्या रह जाता है । कुछ कागज के टुकड़ों, ईट, पत्थरों को समेट कर मनुष्य खुद को धनी मान लेता है । पेट की ज्वाला शांत करने के लिए थोड़ा अन्न, तन ढकने के लिए दो कपड़े और सिर ढकने के लिए थोड़ी छत । जीवन निर्वाह के लिए यही सब ही तोह चाहिए होता है इससे ज्यादा समेट कर रखने का क्या फायदा , पर मनुष्य ज्यादा को समेट कर अपने आप को धनी समझता है । विद्या का क्या घमंड, कुछ काल्पनिक रूढ़ियों को भाषा व संकेतिक चिन्हों को लिपि कहते हैं इन्हीं को रट  रट कर विद्या का घमंड करने का क्या फायदा । सारी तथाकथित विद्यायें वस्तुओं को जानने समझने के लिए है । पशु पक्षी तोह ब...

मनुष्य देह बोहत दुर्लभ है, यह आसानी से नहीं मिलती ।

मानुष जन्म दुर्लभ है, बहुर न दूजी बार । पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुर न लागै डार ।। इस संसार रूपी भवसागर में अनेकों देह हैं जिसे चौरासी कहा जाता है, जैसे पशु, पक्षी, कीट, पतंगे, मनुष्य आदि । पर मनुष्य को छोड़कर सभी देह केवल भोग योनियां हैं, इनमें सोचने समझने का विवेक नहीं होता । जीव आत्मा को कर्मानुसार अलग अलग देह में भटकना पड़ता है, केवल मनुष्य देह में आकर ही जीव इस भवसागर को पार कर सकता है । इस साखी में कबीर साहिब ने इसी बात पर जोर दिया है कि यह मनुष्य देह बोहत दुर्लभ है, इसी में जीव आत्मा की कल्याण साधना हो सकती है । इस मनुष्य देह को पाकर इसे विषयों विकारों में मत गवाओ, मनुष्य देह मिलना बोहत कठिन है । जो मनुष्य देह पाकर इसे पशुओं की भांति विषय भोगने में गवा देता है वह कितना भोला व नासमझ है । मनुष्य देह की दुर्लभता को कबीर साहिब एक पेड़ के पक्के फल से समझाते हुए कहते हैं कि जैसे पेड़ से पक्का हुआ फल गिर पड़ता है और वापिस पेड़ पर नहीं लगता, उसी तरह जब जीव देह को छोड़ देता है तोह वापिस पुनः उसी देह में प्रवेश नहीं कर सकता । दूसरा मानव जन्म मिलना भी आसान नहीं है, जब उसके अच्छे कर्मों...

मन की चंचलता को जीतो ।

बाज़ीगर का बांदरा, ऐसे जीव मन के साथ । नाना नाच नचाये के, ले राखे अपने हाथ ।। जैसे बाज़ीगर बन्दर को नचाता है उससे नाना तरह के खेल कराता है, यही स्थिति जीव की हो गयी है जो मन के वश में आकर मन के अनुसार नाचता रहता है । जीव स्वतंत्र चेतन है, मन एक आभास मात्र है । परन्तु कैसा आश्चर्य है सत्य चेतन जीव असत्य मन के हाथ बिक गया है । बाज़ीगर बन्दर को अपनी डोरी से बांध कर रखता है, फिर उससे कई तरह के खेल करवाता है । खेद है कि ऐसे मन जीव को अपनी आसक्ति की डोरी में बांध कर रखता है और जीव को अपनी इच्छा अनुसार नचाता है । आप देखते नहीं, कैसे पढ़े लिखे सभ्य लोग बीड़ी सिगरेट, शराब, तम्बाकू आदि की आदत बना लेते हैं । और उसकी आसक्ति में सदैव अपने मन की गुलामी करते हैं । वह समझते भी हैं कि यह सब गलत है इसके दुष्परिणाम हैं फिर भी अपने मन को नहीं रोक पाते । इसी प्रकार बीड़ी सिगरेट शराब आदि की आसक्ति में बंधा मनुष्य पूरी जिंदगी मन के अनुसार नाचता रहता है । यह विषय की इच्छाएं ही तोह जीव को नाना नाच नचवाती हैं । यदि जीव विषयों की इच्छा को छोड़ दे तोह कौन उसे विवश कर सकता है । जीव का अपना स्वरूप शुद्ध चेतन का...

सार शब्द को लेकर मन में आती उलझनों का निवारण

वस्तु कहिं खोजे कहिं, केहि विधि आवै हाथ । कहे कबीर तभी पाइये, जब भेदी देवे साथ ।। कबीर साहिब के जिज्ञासु भगत सार शब्द को लेकर उलझन में रहते हैं कि सार शब्द किस गुरू से मिलेगा ? तोह साहिब के भगतो एक बात जान लो कि सार शब्द कहते हैं निचोड़ को जो सबका निचोड़ है सार है, उससे आगे कुछ नहीं है । जैसे दूध का सार घी है और यह सार शब्द कोई दुनिया की वस्तु नहीं कि जो आप गुरू के पास गये और गुरू ने आपको पकड़ा दी कि यह लो बेटा यह है सार शब्द । गुरू का काम है राह बताना चलना आपको ही है गुरू आपको पहले से तय की गयी मंजिल नहीं देने वाला । तोह सार शब्द का भेदी गुरू होता है सार शब्द देने वाला कोई गुरू नहीं है । सार शब्द एक गुप्त खज़ाना है गुरू आपको उस ख़ज़ाने तक पहुंचने का भेद देगा, अब खज़ाना लाने आपको ही जाना है, गुरू आपके लिए खज़ाना लाने नहीं जाने वाला । गुरू ने आपको भेद दे देना है कि यहाँ से खुदाई करो आपको पानी मिलेगा । अब खुदाई आपको ही करनी है आप कितने दिन में करोगे कितनी मेहनत से करोगे यह सब आप पर निर्भर है । गुरू आपके लिए खुदाई नहीं करने वाला । गुरू आपको दूध से घी बनाने की विधि बता सकता है घी आपको ह...

पूरे गुरू के प्रति समर्पित हो जाओ, अधूरे के प्रति नहीं ।

पूरा साहिब सेइये, सब विधि पूरा होये । ओछे से नेह लगाये के, मूलहु आवै खोय ।। अपने स्वरूप के विषय में जिसे सच्चा ज्ञान है, व्यवहार बरतने की सम्यक समझ है और पवित्र रहनी में जो पूर्णयता चलता है वही पूरा साहिब है । इस संसार में कोई बिरला ही मनुष्य होता है जो सांसारिकता से उपराम होकर यह सोचता है कि मैं कौन हूँ ? जगत क्या है ? मेरा और जगत का संबंध कैसा है ? और जीवन का लक्ष्य क्या है । ऐसा सोचने वाला जिज्ञासु व ज्ञान की इच्छावाला कहा जाता है । जब उसे किसी गुरू द्वारा इन सबका ज्ञान होता है तब उसे मुमुक्षु कहा जाता है यानी मोक्ष की इच्छा रखने वाला । इसलिए वह बन्धनों को छोड़ने का अभ्यास करता है । बन्धन हैं मन के विकार , मन के विकारों से ही इंद्रियों में गलत आदतें रहती हैं । जो इन सभी बन्धनों को तोड़ने के लिए सदैव प्रत्यनशील रहता है उसे कहते हैं साधक । ऐसे में कभी मन से जीत होती है तो कभी हार । जब अभ्यास करते करते व्यक्ति पूर्ण अनासक्त एवं चारों ओर से निष्काम हो जाता है तब वह संत हो जाता है । पूर्णत्व प्राप्त को सन्त कहते हैं । जब कुछ खाने पीने, घूमने, पाने, भोगने, जीने मरने की इच्छा नहीं र...