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Showing posts with the label साधना

मन को विषय वासनाओं से बचाये रखने के लिए सत्संग बोहत ज़रूरी है ।

नित खरसान लोहाघुन छूटे, नित की गोष्ट माया मोह टूटे । जैसे लोहे के औजार में हवा और पानी के संयोग से जंग लग जाता है परन्तु उसे मांजते रहो तोह जंग छूटता रहता है और औजार चमकता रहता है । वैसे ही हमारे मन की दशा है । पूर्व वासनाएँ, मन इंद्रिय, विषय विकारों, प्राणी तथा नाना व्यवहार के संबंध में मनुष्य के मन में मलिनता आने की संभावना बनी रहती है । इनसे साधक तभी बचा रह सकता है जब वह निरन्तर साधु संतों सज्जनों की संगत करे और उनसे स्वरूप ज्ञान, सदाचार और सद्गुणों की चर्चा करता व सुनता रहे । संत सज्जनों के उत्तम आदर्श देखने व उनकी वाणियों को सुनकर उनका मनन करने से साधक का मन शुद्ध बना रहता है । गृहस्थ भक्तों से कहा जाता है कि वह प्रतिदिन अपने घर में अपने पूज्य सन्तों के ज्ञान उपदेश की वार्ता एवं सत्संग करते रहें । इन बातों का रोज़ रोज़ उनके मन पर प्रभाव पड़ेगा । परन्तु बोहत कम ही साधक ऐसा करते हैं । हर गृहस्थ को अपने घर में नित्य एक समय सत्संग का आयोजन करना चाहिए और पूरे परिवार को इसका लाभ लेना चाहिए अगर आस पड़ोस के लोग भी इसमें शामिल हों तोह और भी अच्छा है । फिर गांव या मोहल्ले में भी सत्संग ...

साधना में निरन्तर उत्साह से लगे रहना ही सफलता की कुंजी है ।

जैसी लागी ओर की, वैसे निबहै छोर । कौड़ी कौड़ी जोड़ि के, पूँजी लक्ष करोर ।। किसी उद्देश्य या क्षेत्र में शुरू से लेकर अंत तक एक ही भाव से लगे रहने वाले बोहत कम लोग होते हैं, इसीलिए जीवन में सफलता बोहत कम लोगों को मिल पाती है । एक संगीतज्ञ से एक आदमी ने कहा कि मैं भी आपकी तरह महान संगीतज्ञ बनना चाहता हूँ तोह संगीतज्ञ ने कहा इसमें कुछ भी कठिन नहीं है तुम निरंतर लग्न से तीस पैंतीस साल संगीत में लगे रहिये आप निश्चित ही एक महान संगीतज्ञ बन जाओगे । जो अपने निश्चित लक्ष्य को पाने के लिए लगातार दीर्घ काल तक एक समान श्रम करता है वह एक दिन सफल हो जाता है । सन्तों की संगत पाकर लोग शुरू शुरू में भक्तिभाव में बोहत ओतप्रोत हो जाते हैं परन्तु थोड़े दिनों के बाद ही वह यह सब प्रायः भूल जाते हैं । कितने ही लोग साधना में बड़े उत्साह से लगते हैं पर उनका यह उत्साह ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाता । वह पुनः मन की मलिनता में घिर जाते हैं और कहने लगते हैं कि वैराग्य, भक्ति, आध्यात्म यह अब बकवास बातें हैं । जिस किसान को केवल फसल पाने में ही आनंद आता हो, किसानी में नहीं, जिस व्यापारी को केवल मुनाफ़े में आनंद आ...