Skip to main content

Posts

Showing posts with the label साखी

अपने खुद के आत्मस्वरूप से बाहर कोई परमात्मा नहीं है ।

अस्ति कहौं तोह कोइ न पतीजे, बिन अस्ति का सिद्धा । कहहिं कबीर सुनो हो सन्तों, हीरी हीरा बेधा ।। मनुष्य का आत्म अस्तित्व ही सर्वदा सत्य व विद्यमान (अस्ति) वस्तु है । जब कोई उसकी ओर सुझाव देता है तोह कोई विश्वास नहीं करता । लोग अत्यंत मिथ्या व काल्पनिक वस्तु का पक्ष देकर सिद्ध बन रहे हैं । कबीर साहिब कहते हैं सुनो सन्तों , जैसे हीरे के कण ही हीरे को काट देते हैं उसी तरह जीव के मन से पैदा हुई कल्पना ही उसका पथभ्र्ष्ट कर रही हैं । आइये अब विस्तार से जानते हैं , अस्ति कहते हैं सत्ता को, वह मैं के स्वरूप में है । मैं के दो रूप हैं, एक माया वाला और दूसरा आत्मिक । शरीर व शरीर के नाम आदि तक जहां भी मैं इस्तेमाल किया जाता है वह माया का मैं है । और चेतन सत्ता मात्र मैं आत्मिक व परमसत्य है । यह मैं ही वास्तविक सत्ता है और सत्य भी । अपने आप के विषय में तोह किसी को संदेह नहीं होता कि मैं हूँ या नहीं । मैं तोह निःसंदेह हूँ । आप कुछ सोच रहे हैं सन्देह कर रहे हैं तोह इसका मतलब कोई है जो यह सब कर रहा है, अगर कोई होगा ही नहीं तोह कैसा सन्देह कैसा सोच विचार । यह जो सोचने वाला है यही विचार करने वाल...

हिन्दू और मुसलमानों की भूल ।

कितनो मनावो पाँव परि, कितनो मनावो रोय । हिन्दू पूजे देवता, तुर्क न काहू होय ।। क्या हिन्दू क्या मुसलमान, यह दोनों जीवित प्राणियों में परमात्मा को नहीं देखते । यह या तोह मिट्टी, पत्थर, काष्ट, अष्टधातु की मूर्तियों में परमात्मा को देखते हैं या शून्य आकाश में देखते हैं । इसलिए वह परमात्मा को प्रेम समर्पण के लिए भेड़, बैल, भैंस, बकरा, गाय, ऊँट, मुर्गा, सूयर आदि की बलि या कुर्बानी देते हैं जो कि घोर जंगलीपन है । जीवित देहधारी प्रत्यक्ष देवता है, उन्हें पत्थर के देवता या शून्य आकाश में स्थित किसी अल्लाह के नाम पर मार काट देना कितनी अज्ञान की बात है । न तोह पत्थर पिंडी आदि में कोई ईश्वर है और न ही शून्य आकाश में कोई अल्लाह है । मानव देहि तोह प्रत्यक्ष देवता है,  ईश्वर का ही अंश सभी जीवित देहों में समाया हुआ है , इन जीवित प्राणियों की पूजा करनी चाहिए इनका सत्कार करना चाहिए । परंतु आदमी के दिमाग को लकवा मार गया है वह पत्थरों में ईश्वर देखता है पत्थर पूजता है, शून्य आकाश में किसी ईश्वर को देखता है । और उसके नाम पर जीवित प्राणियों को मारता है । जिंदा प्राणियों में ईश्वर को नहीं द...

एक अज्ञान के कारण सभी योग्यताएं व्यर्थ चली जाती हैं ।

नौ मन दूध बटोरि के, टिपके किया बिनाश । दूध फाटि काँजी भया, हुवा घृत का नाश ।। नौ मन दूध इकट्ठा किया गया, परन्तु उसमें सिरके आदि खट्टे पदार्थ की कुछ बूंदे डाल दी गयी तोह सारा दूध ही नष्ट हो गया । क्योंकि दूध फटकर खट्टा पानी हो गया और घी का नाश हो गया । इस साखी में कबीर साहिब ने नौ मन दूध इकट्ठा करने की बात कही है, जिसका लाक्षणिक अर्थ है पांच तत्व, तीन गुण युक्त अष्टधाप्रकृति और नौंवा जीव अर्थात अष्टधा प्रकृति युक्त मनुष्य देह में जीव निवास करता है । परन्तु अज्ञान का टिपका पड़ने से सारी योग्यताएं व्यर्थ हो जाती हैं । अगर नौ मन दूध का अष्टधा प्रकृति और जीव से अर्थ न भी लिया जाए तोह भी काम चल जाता है । नौ मन दूध का लाक्षणिक अर्थ है पूरी योग्यता । इसमें कारण है 1 से 9 तक के संख्या अंक, इसके बाद 0 होता है, यही घूम घुमाकर अंकों की संख्या बनाते हैं । इसलिए नौ मन संख्या की अधिकता का सूचक है । जैसे कहावत है " न नौ मन तेल इकठ्ठा होगा और न राधा नाचेगी " । आठ मन या दस मन कहने का प्रचलन नहीं है किंतु नौ मन कहने का प्रचलन है । "नौ मन दूध बटोरि के" का सरल लाक्षणिक अर्थ है...

मनुष्यों में केवल गुण सर्वश्रेष्ठ हैं, गुणविहीन मनुष्य तोह पशुओं से भी बेकार है ।

मानुष तेरा गुण बड़ा, ,माँसु न आवै काज । हाड़ न होते आभरण, त्वचा न बाजन बाज ।। मनुष्य की विशेषता उसके उत्तम विचारों व सद्गुणों में है । यदि उसने अपने मानवीय गुणों व सद्गुणों का विकास नहीं किया तोह वह पशुओं से भी खराब है । पशुओं के बाल, हड्डी, चमड़ी आदि दूसरों के काम आ जाते हैं, पशु अपने जीवनकाल व मरने के बाद भी दूसरों की सेवा में लग जाते हैं । पशु अपने स्वभाविक कर्म को छोड़कर कोई दुष्कर्म नहीं करते । पशु जब किसी की फसल को चरता है तोह पेट भर जाने के बाद चरना छोड़ देता है । मनुष्य का पेट भरा रहने के बाद भी वह दूसरों के घर चोरी करता है, जेब काटता है, मिलावटखोरी, घूसखोरी, चोरबाजारी, जमाखोरी, धोखेबाजी आदि सब अपराध करता है । जिन पशु पक्षियों के जो स्वभाविक भोजन हैं, वह उसे ही ग्रहण करते हैं । जो पशु पक्षी मांसाहारी होते हैं वह प्रायः मांस ही खाते हैं और जो शाकाहारी होते हैं वह मांस नहीं खाते । मनुष्य ऐसा जंतु है जो शाकाहारी होकर भी मांस खाता है । वह बैल, गाय, भैंस, बकरा, सांप, भेड़, मेंढक, मुर्गा, सूयर आदि अब चट कर जाता है । इतना ही नहीं मनुष्य शराब, गांजा, भांग, तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट आदि...

कर्मों के बंधन व इनसे जीव मुक्त कैसे हो ?

तौ लौं तारा जगमगै, जौ लौं उगै न सूर । तौ लौं जीव कर्म वश डौलै, जौ लौं ज्ञान न पूर ।। कबीर साहिब का इस साखी का उदाहरण कितना सटीक है यह समझते ही बनता है । तारे रात को जगमगाते हैं । वे अपनी पूर्ण चमक दमक के साथ प्रकाश करते हैं । परन्तु उनकी चमक दमक तभी तक है जब तक सूर्य उदय नहीं होता । सूर्य के उदय होते ही वह दिखाई भी नहीं देते । यही दशा जीवों के कर्मों की है । सब जीव शुभाशुभ कर्मों के अधीन बने संसार सागर में भटक रहे हैं । यह कर्मों की जगमहागट इसलिए है कि जीव को अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं है । जब स्वरूपज्ञानी सूर्य उदय होता है तब अज्ञान अंधकार अपने आप समाप्त हो जाता है । फिर जीव का भटकना भी बंद हो जाता है । जन्म मरण से छूटकर जीव का अपने स्वरूप में स्थित होना यह जीव का भटकना बंद होना है । परन्तु इसका व्यवहारिक पक्ष है देह रहते रहते मानसिक द्वन्दों से मुक्त होकर प्रशांत हो जाना जो सबके अनुभव की बात है, यही सर्वाधिक उपयोगी है । ज्ञानोदय का अर्थ यह नहीं है कि बोहत बौद्धिक ज्ञान या शास्त्रज्ञान हो जाए । ज्ञानोदय का अर्थ है अपने  चेतन स्वरूप को जड़ से सर्वदा भिन्न समझकर विषय वासनाओ...

जीव हत्या का पाप नहीं छूट सकता, चाहे करोड़ों बार तीर्थ व दान पुण्य कर लिए जाएं ।

जीव मति मारो बापुरा, सबका एकै प्राण । हत्या कबहूँ न छूटिहैं, जो कोटिन सुनो पुराण ।। जीव घात न कीजिए, बहुरि लैत वह कान । तीर्थ गये न बाँचिहो, जो कोटि हीरा देहु दान ।। सामान्य तोह सामान्य हैं कितने ही धार्मिक कहलाने वाले लोग मनुष्य के अलावा सभी जीवों को मारकर खाने की वस्तु समझते हैं । शायद वह मनुष्य को भी मारकर खाने की वस्तु समझते पर मनुष्य को मारकर खाना इतना सरल नहीं, इसलिए मनुष्य को छोड़ कर बाकि जीवों को खाना उन्होंने अपना धर्म बना लिया । चीता और शेर मांसाहारी प्राणी हैं वह दूसरे जीवों को मारकर खाते हैं ,केवल अपने पेट को भरने के लिए । किंतु हिसंक मनुष्य ऐसा जानवर है जो मूलतः शाकाहारी है, पर अपने जीभ के स्वाद के लिए प्राणियों को मारता है केवल अपना पेट भरने के लिए नहीं बल्कि लाशों के व्यापार करके पैसे इकट्ठे करता है । कितने ही चतुर लोग ईश्वर अल्लाह और देवी देवताओं के नाम पर जीव हत्या कर उनको खाते हैं और कहते हैं इससे उनको पाप नहीं लगता । उन्होंने जीव हत्या के नाम कुर्बानी और बलि रख लिए हैं । परन्तु न तोह नाम बदलने से जीव हत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी और न ही तथाकथित ईश्वर और द...

साधना में निरन्तर उत्साह से लगे रहना ही सफलता की कुंजी है ।

जैसी लागी ओर की, वैसे निबहै छोर । कौड़ी कौड़ी जोड़ि के, पूँजी लक्ष करोर ।। किसी उद्देश्य या क्षेत्र में शुरू से लेकर अंत तक एक ही भाव से लगे रहने वाले बोहत कम लोग होते हैं, इसीलिए जीवन में सफलता बोहत कम लोगों को मिल पाती है । एक संगीतज्ञ से एक आदमी ने कहा कि मैं भी आपकी तरह महान संगीतज्ञ बनना चाहता हूँ तोह संगीतज्ञ ने कहा इसमें कुछ भी कठिन नहीं है तुम निरंतर लग्न से तीस पैंतीस साल संगीत में लगे रहिये आप निश्चित ही एक महान संगीतज्ञ बन जाओगे । जो अपने निश्चित लक्ष्य को पाने के लिए लगातार दीर्घ काल तक एक समान श्रम करता है वह एक दिन सफल हो जाता है । सन्तों की संगत पाकर लोग शुरू शुरू में भक्तिभाव में बोहत ओतप्रोत हो जाते हैं परन्तु थोड़े दिनों के बाद ही वह यह सब प्रायः भूल जाते हैं । कितने ही लोग साधना में बड़े उत्साह से लगते हैं पर उनका यह उत्साह ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाता । वह पुनः मन की मलिनता में घिर जाते हैं और कहने लगते हैं कि वैराग्य, भक्ति, आध्यात्म यह अब बकवास बातें हैं । जिस किसान को केवल फसल पाने में ही आनंद आता हो, किसानी में नहीं, जिस व्यापारी को केवल मुनाफ़े में आनंद आ...

मन के अहंकार को त्यागे बिना, सांसारिक त्याग सार्थक नहीं ।

माया तजे तोह क्या भया, जो मान तजा नहीं जाए ।  जेहि मान मुनिवर ठगे, सो मान सबन को खाए ।। इस साखी में कबीर साहिब ने साधु लोगों के अहंकार की बात की है । घर, परिवार, धन, दौलत को छोड़कर साधु बन गये और साधु बनकर अपने त्याग का अपने साधु होने का अहंकार पाल लेने से कोई फायदा नहीं होने वाला । साधु का वेष ही मृतक का चिन्ह है जिसमें पूरी विनम्रता होनी चाहिए । जो संसार से मर गया उसे क्या अहंकार हो सकता है । संसार में जीव देह को छोड़कर चला जाता है तब उसे मरना कहा जाता है । और साधु दशा में मन के सारे अहंकार जब समाप्त हो जाते हैं तब उसे साधुत्व कहा जाता है ।  परन्तु आश्चर्य है कि कितने लोग साधु का वेष धारण करने के बाद अहंकार की महामूर्ति हो जाते हैं । धन का नशा, विद्या का नशा, पद का नशा तो होता ही है पर त्याग का नशा भी आ जाता है । सारे नशे जीव को पतित करने वाले हैं । आप पुराण और महाकाव्यों को पढ़िये तोह पता चलेगा कि कैसे ऋषि मुनि छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे को श्राप देते, मारा मारी करते और एक दूसरे के आश्रम जला देते थे । वशिष्ठ विश्वामित्र का और विश्वामित्र वशिष्ठ का विध्वंस करते है...

मृत्यु परम सत्य है, पर मनुष्य इसे याद नहीं रखना चाहता ।

मूवा है मरि जाहुगे, मुये कि बाजी ढोल । सपन स्नेही जग भया, सहिदानी रहिगौ बोल ।। मृत्यु जीवन का परम सत्य है, इसको झुठलाया नहीं जा सकता । किन्तु खेद है कि मनुष्य इसको झुठलाने में जीवन भर लगा रहता है । लोग मृत्यु को याद नहीं रखना चाहते । यदि कोई उनको मृत्यु की याद कराना चाहे तोह लोग नाख़ुश हो जाते हैं । किसी पुत्र जन्म या विवाह आदि के अवसर पर अगर कोई व्यक्ति मृत्यु का नाम ले लेवे तोह लोग कहते हैं कि चुप भी रहो भले आदमी, ऐसे मंगल अवसर पर किस अमंगल का नाम ले रहे हो । लोगों के लिए जन्म और विवाह ही मंगल मौके हैं और मृत्यु अमंगल है । याद रखो किसी जन्म या विवाह के मौके पर तोह हम उसकी गहमागहमी में माया मोह में भूल जाते हैं उलझे रहते हैं । जबकि किसी संगी साथी की मृत्यु के मौके पर हमारा मन संसार से कट कर शांत रहता है । लोग दुकान को बंद नहीं करते दुकान को बढ़ाते हैं । जब दुकान को बंद करने का समय हो तोह नौकर को बोल देते हैं कि दुकान बढ़ा दो , बंद करना अमंगल बात है इसलिए बोलते हैं दुकान को बढ़ा दो यह मंगल बात है । कितना मूर्ख हो चुका है व्यक्ति हर पल खुद को ही ठगे जा रहा है सत्य से भाग रहा है । शत...

धोखेबाज व अधूरे गुरूओं के मायाजाल से सावधान रहना चाहिए ।

साहु  चोर चीन्है नहीं, अंधा मति का हीन । पारख बिना विनाश है, कर विचार होहु भीन ।। जैसे श्रेष्ठी शब्द का अपभ्रंश होक सेठ शब्द बना है, वैसे ही साधु शब्द से साहु शब्द बना हुआ है । साहु का अर्थ होता है जो सत्य का व्यवहार करता है । सज्जन और ईमानदार को साहु कहते हैं । जो दूर दराज से माल लाकर लोगों में बेचता था और लोगों से माल लेकर दूर देश में बेचता था । उसके सत्य व ईमानदारी वाले व्यवहार के कारण उनको साहु व महाजन आदि नामों से पुकारा जाता था । पर इस बात का खेद है कि चोरी, बेईमानी के कारण आज उसी वर्ग को सबसे अधिक धोखेबाज, चोर व बेईमान समझा जाता है । यह सच है कि आज भी कितने ही व्यापारी व्यवहार में ईमानदार हैं पर चोर व बेईमान व्यापारियों के साथ उनको भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है । गुरू दर्जा तोह सर्वोच्च है । गुरू वह है जिसका ज्ञान सत्य हो, जिसका व्यवहार सत्य हो । पर खेद है कि गुरू के नाम से आजकल धंधेबाज और धोखेबाज अधिक हो गये हैं । वह अपने जादू से शिष्यों के सारे पाप काट देते हैं और ऋद्धि सिद्धि का दावा करके समाज को बेवकूफ बनाते हैं । वह अपने आप को ईश्वर के अवतार व प्रसिद्ध ...

ज्ञान रूपी हीरे को केवल योग्य मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है ।

हीरा तहां न खोलिए, जहाँ कुँजरों की हाट । सहजे गाँठि बांध के, लगिये अपनी बाट ।। कबीर साहिब ने इस साखी में ज्ञान को हीरे के रूप में पेश किया है और कहा है कि हीरे को केवल पारखी की पास ही खोलना चाहिए । कुँजरों की बाट यानी सब्ज़ी बेचने वालों का बाज़ार, अब सब्ज़ी मंडी में अगर कोई जौहरी अपनी हीरे की दुकान लगाकर बैठ जाए तोह उसके हीरे वहां नहीं बिक सकते । क्योंकि वहां आने वाले लोगों के पास इतना धन नहीं होगा और न ही हीरे की परख होगी कि वह हीरे को खरीद सकें । इसी तरह जो लोग मंत्र तंत्र साधना, बाहरी पूजा, कर्मकांड आदि में उलझे हुए हैं उनके सामने जड़ चेतन, आत्म ज्ञान आदि की बातें नहीं करनी चाहिए । उनके आगे अपनी समझ व शक्ति बर्बाद नहीं करनी चाहिए । उनको इन बातों से कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि उनकी विवेक शक्ति ही शुन्य हो चुकी होती है वह मिथ्या भक्ति में बोहत उलझ चुके होते हैं । अब प्रश्न उठता है कि जब जन साधरण के सामने ज्ञान की बात नहीं करेंगे तोह उनकी जड़ बुद्धि समाप्त कैसे होगी । बोहत से जड़ बुद्धि वाले लोग ज्ञान की बात सुनकर अपने मिथ्या भक्ति के सिद्धांतों को त्याग देते हैं । इसका जवाब ...

मूर्ख को ज्ञान उपदेश देने का कोई फायदा नहीं होने वाला ।

मूर्ख को समझावते, ज्ञान गाँठि का जाय । कोयला होय न ऊजरा, सौ मन साबुन लाय ।। कबीर साहिब ने इस साखी में एक सरल बात पर प्रकाश किया है । वह कहते हैं कि कभी मूर्ख मनुष्य को ज्ञान उपदेश दिया जाए तोह वह उससे लाभ नहीं लेने वाला बल्कि उल्टा इसका दुरुपयोग ही करेगा । वह अच्छी सीख का या तोह सामने ही मज़ाक उड़ा देगा या पीठ पीछे मज़ाक उड़ाएगा, हंसी करेगा । सीख के उल्टे आचरण वह जग में अपनी वरियता जाहिर करेगा । ऐसे लोगों को उपदेश देने से उपदेश देने वाले के मन में असंतोष आ सकता है, उसकी शान्ति भंग हो सकती है । मूर्ख को तोह को कुछ फर्क नहीं पड़ेगा पर उपदेश देने वाले की शांति भंग हो गयी, इसी को ज्ञान गाँठि का जाना कहा जाता है । आप सभी जानते ही हैं कि कोयला अंदर और बाहर से काला होता है, उसे सौ मन साबुन लगा कर पानी से धोया जाए तब भी कोयला ऊजला होने वाला नहीं है । मूर्खों की यही दशा है । वह भीतर से बाहर तक काले कोयले हैं । वह शुद्ध नहीं हो सकते, चाहे उनको लाख बार उपदेश दे दिया जाए । यह कहा जा सकता है कि कोयला तोह जड़ है, मनुष्य चेतन है, वह अपनी दृष्टि बदल दे तोह अवश्य सुधर जाएगा । यह तर्क ठीक है पर फिर...

मन रूपी हाथी को काबू करने के लिए विवेक रूपी अंकुश जरूरी है ।

मन मतंग गइयर हने, मनसा भई सचान । जंत्र मंत्र माने नहीं, लागी उड़ि उड़ि खान ।। ( मतंग - हाथी, गइयर- महावत, हने- मारता है, मनसा- इच्छाएं, सचान- बाज पक्षी) मन उन्मत्त हाथी के समान है यह जीव रूपी महावत को मारता रहता है । और इच्छाएं बाज पक्षी के समान हैं जो उड़ उड़कर जीवों को खाता रहता है । जीव अविनाशी चेतन है और मन एक आभ्यासिक वृति मात्र है । परन्तु जीव अपने स्वरूप को भूल कर दीन बन गया है और उसकी बनाई वृति ही उसपर सवार हो गयी है । महावत हाथी पर सवार होकर अंकुश से उसे काबू में रखता है, परन्तु जब हाथी उन्मत्त हो जाए तोह तोह वह महावत को गिराकर मार देता है । हाथी एक शक्तिशाली देह वाला है इसलिए वह महावत को मार सकता है, परन्तु मन कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं जो बलपूवर्क जीव को मार दे । मन तोह इसलिए जीव को परेशान करता है क्योंकि जीव अपना स्वरूप भूल कर विषयों का गुलाम बना रहता है । यदि जीव अपने स्वरूप को जान ले और अपने आप में स्थित हो जाए तोह मन उसका गुलाम हो जाएगा । जिसको स्वरूप ज्ञान हो जाता है वह इच्छाओं को छोड़ देता है और मन उसके अधीन हो जाता है । कबीर साहिब ने मन और उसकी इच्छाओं के उन्मत्त ...

सत, रज व तम तीनों गुणों पर विजय प्राप्त करो ।

तामस केरे तीन गुण, भँवर लेइ तहां बास । एकै डाली तीन फल, भाँटा ऊख कपास ।। तामस कहते हैं अंधकार को माया को । कबीर साहिब कहते हैं कि सत, रज और तम तीनों गुण माया के पेट में हैं । अर्थात एक माया की डाली पर यह तीन फल लगते हैं जो एक दूसरे के परस्पर विरोधी हैं । आप किसी एक शाखा पर भांटा, ऊख व कपास को लगा देखोगे तोह आश्चर्य ही होगा । माया और प्रकृति की डाली में यही बात है, इसमें परस्पर विरोधी तीन गुण एक साथ रहकर सृष्टि का संचालन करते हैं । आप जानते ही हैं तेल, बत्ती और आग तीनों परस्पर विरोधी होते हैं पर तीनों के मिलने से ही प्रकाश उत्पन्न होता है । इसी तरह सत, रज, और तम भी एक दूसरे के परस्पर विरोधी होते हुए भी संसार के कार्यों का संपादन करते हैं । साहिब कहते हैं कि जीव का मन भंवरा इसी त्रिगुणात्मक जगत के पदार्थों में गन्ध लेता रहता है । यह ठीक है कि सत, रज और तम तीनों गुणों के अलग अलग परिणाम हैं, पर है सभी क्षणिक । गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि सतोगुण उच्च गति को, रजोगुण मध्यम गति को और तमोगुण निम्न गति को ले जाते हैं । इसी लिए श्री कृष्ण अर्जुन को इन तीनों गुणों से अलग होकर सभी द्व...

ब्राह्मण कौन है और चमार कौन है ?

बड़े गये बड़ापने, रोम रोम हंकार । सतगुरू के परचै बिना, चारो वरण चमार ।। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि कि भौतिक पदार्थों का अहंकार करना । धन, विद्या, जाति, शरीर, जवानी, सौंदर्य आदि भौतिक पदार्थों में मनुष्य इतना डूबा हुआ रहता है कि इन क्षणिक वस्तुओं को लेकर इतराता रहता है । सारे अहंकार की जड़ शरीर है और इसके गलते तथा विनशते देर नहीं लगती । तोह मनुष्य किस चीज़ का अहंकार करता है । शरीर के छूटते ही सभी वस्तुओं से नाता छूट जाता है । फिर उसका क्या रह जाता है । कुछ कागज के टुकड़ों, ईट, पत्थरों को समेट कर मनुष्य खुद को धनी मान लेता है । पेट की ज्वाला शांत करने के लिए थोड़ा अन्न, तन ढकने के लिए दो कपड़े और सिर ढकने के लिए थोड़ी छत । जीवन निर्वाह के लिए यही सब ही तोह चाहिए होता है इससे ज्यादा समेट कर रखने का क्या फायदा , पर मनुष्य ज्यादा को समेट कर अपने आप को धनी समझता है । विद्या का क्या घमंड, कुछ काल्पनिक रूढ़ियों को भाषा व संकेतिक चिन्हों को लिपि कहते हैं इन्हीं को रट  रट कर विद्या का घमंड करने का क्या फायदा । सारी तथाकथित विद्यायें वस्तुओं को जानने समझने के लिए है । पशु पक्षी तोह ब...

मनुष्य देह बोहत दुर्लभ है, यह आसानी से नहीं मिलती ।

मानुष जन्म दुर्लभ है, बहुर न दूजी बार । पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुर न लागै डार ।। इस संसार रूपी भवसागर में अनेकों देह हैं जिसे चौरासी कहा जाता है, जैसे पशु, पक्षी, कीट, पतंगे, मनुष्य आदि । पर मनुष्य को छोड़कर सभी देह केवल भोग योनियां हैं, इनमें सोचने समझने का विवेक नहीं होता । जीव आत्मा को कर्मानुसार अलग अलग देह में भटकना पड़ता है, केवल मनुष्य देह में आकर ही जीव इस भवसागर को पार कर सकता है । इस साखी में कबीर साहिब ने इसी बात पर जोर दिया है कि यह मनुष्य देह बोहत दुर्लभ है, इसी में जीव आत्मा की कल्याण साधना हो सकती है । इस मनुष्य देह को पाकर इसे विषयों विकारों में मत गवाओ, मनुष्य देह मिलना बोहत कठिन है । जो मनुष्य देह पाकर इसे पशुओं की भांति विषय भोगने में गवा देता है वह कितना भोला व नासमझ है । मनुष्य देह की दुर्लभता को कबीर साहिब एक पेड़ के पक्के फल से समझाते हुए कहते हैं कि जैसे पेड़ से पक्का हुआ फल गिर पड़ता है और वापिस पेड़ पर नहीं लगता, उसी तरह जब जीव देह को छोड़ देता है तोह वापिस पुनः उसी देह में प्रवेश नहीं कर सकता । दूसरा मानव जन्म मिलना भी आसान नहीं है, जब उसके अच्छे कर्मों...

मन की चंचलता को जीतो ।

बाज़ीगर का बांदरा, ऐसे जीव मन के साथ । नाना नाच नचाये के, ले राखे अपने हाथ ।। जैसे बाज़ीगर बन्दर को नचाता है उससे नाना तरह के खेल कराता है, यही स्थिति जीव की हो गयी है जो मन के वश में आकर मन के अनुसार नाचता रहता है । जीव स्वतंत्र चेतन है, मन एक आभास मात्र है । परन्तु कैसा आश्चर्य है सत्य चेतन जीव असत्य मन के हाथ बिक गया है । बाज़ीगर बन्दर को अपनी डोरी से बांध कर रखता है, फिर उससे कई तरह के खेल करवाता है । खेद है कि ऐसे मन जीव को अपनी आसक्ति की डोरी में बांध कर रखता है और जीव को अपनी इच्छा अनुसार नचाता है । आप देखते नहीं, कैसे पढ़े लिखे सभ्य लोग बीड़ी सिगरेट, शराब, तम्बाकू आदि की आदत बना लेते हैं । और उसकी आसक्ति में सदैव अपने मन की गुलामी करते हैं । वह समझते भी हैं कि यह सब गलत है इसके दुष्परिणाम हैं फिर भी अपने मन को नहीं रोक पाते । इसी प्रकार बीड़ी सिगरेट शराब आदि की आसक्ति में बंधा मनुष्य पूरी जिंदगी मन के अनुसार नाचता रहता है । यह विषय की इच्छाएं ही तोह जीव को नाना नाच नचवाती हैं । यदि जीव विषयों की इच्छा को छोड़ दे तोह कौन उसे विवश कर सकता है । जीव का अपना स्वरूप शुद्ध चेतन का...

सार शब्द को लेकर मन में आती उलझनों का निवारण

वस्तु कहिं खोजे कहिं, केहि विधि आवै हाथ । कहे कबीर तभी पाइये, जब भेदी देवे साथ ।। कबीर साहिब के जिज्ञासु भगत सार शब्द को लेकर उलझन में रहते हैं कि सार शब्द किस गुरू से मिलेगा ? तोह साहिब के भगतो एक बात जान लो कि सार शब्द कहते हैं निचोड़ को जो सबका निचोड़ है सार है, उससे आगे कुछ नहीं है । जैसे दूध का सार घी है और यह सार शब्द कोई दुनिया की वस्तु नहीं कि जो आप गुरू के पास गये और गुरू ने आपको पकड़ा दी कि यह लो बेटा यह है सार शब्द । गुरू का काम है राह बताना चलना आपको ही है गुरू आपको पहले से तय की गयी मंजिल नहीं देने वाला । तोह सार शब्द का भेदी गुरू होता है सार शब्द देने वाला कोई गुरू नहीं है । सार शब्द एक गुप्त खज़ाना है गुरू आपको उस ख़ज़ाने तक पहुंचने का भेद देगा, अब खज़ाना लाने आपको ही जाना है, गुरू आपके लिए खज़ाना लाने नहीं जाने वाला । गुरू ने आपको भेद दे देना है कि यहाँ से खुदाई करो आपको पानी मिलेगा । अब खुदाई आपको ही करनी है आप कितने दिन में करोगे कितनी मेहनत से करोगे यह सब आप पर निर्भर है । गुरू आपके लिए खुदाई नहीं करने वाला । गुरू आपको दूध से घी बनाने की विधि बता सकता है घी आपको ह...

पूरे गुरू के प्रति समर्पित हो जाओ, अधूरे के प्रति नहीं ।

पूरा साहिब सेइये, सब विधि पूरा होये । ओछे से नेह लगाये के, मूलहु आवै खोय ।। अपने स्वरूप के विषय में जिसे सच्चा ज्ञान है, व्यवहार बरतने की सम्यक समझ है और पवित्र रहनी में जो पूर्णयता चलता है वही पूरा साहिब है । इस संसार में कोई बिरला ही मनुष्य होता है जो सांसारिकता से उपराम होकर यह सोचता है कि मैं कौन हूँ ? जगत क्या है ? मेरा और जगत का संबंध कैसा है ? और जीवन का लक्ष्य क्या है । ऐसा सोचने वाला जिज्ञासु व ज्ञान की इच्छावाला कहा जाता है । जब उसे किसी गुरू द्वारा इन सबका ज्ञान होता है तब उसे मुमुक्षु कहा जाता है यानी मोक्ष की इच्छा रखने वाला । इसलिए वह बन्धनों को छोड़ने का अभ्यास करता है । बन्धन हैं मन के विकार , मन के विकारों से ही इंद्रियों में गलत आदतें रहती हैं । जो इन सभी बन्धनों को तोड़ने के लिए सदैव प्रत्यनशील रहता है उसे कहते हैं साधक । ऐसे में कभी मन से जीत होती है तो कभी हार । जब अभ्यास करते करते व्यक्ति पूर्ण अनासक्त एवं चारों ओर से निष्काम हो जाता है तब वह संत हो जाता है । पूर्णत्व प्राप्त को सन्त कहते हैं । जब कुछ खाने पीने, घूमने, पाने, भोगने, जीने मरने की इच्छा नहीं र...

भेड़ों के झुंड न बनो, पारख विवेकी बनो ।

कैसी गति संसार की, ज्यों गाडर की ठाट । एक पड़ा जो गाड़ में, सबै गाड़ में जात ।। कबीर साहिब इस साखी में कह रहे हैं कि संसार मे लोगों की दशा भेड़ों के झुंड जैसी है । यदि एक भेड़ गड्ढे में गिर जाए तोह उसके पीछे सारी भेड़ें गड्ढे में गिरती चली जाती हैं । विस्तार से जानते हैं, एक आदमी ने कहा कि अमुक व्यक्ति पानी में फूंक मारकर या छू कर देता है, तोह उस पानी के सेवन से सभी ऋद्धि सिद्धियां मिलती हैं । तोह इस बात के पीछे पढ़, अनपढ़, गांव वाले, शहरी सभी लाइन लगा के खड़े हो जाते हैं । तांत्रिक, सोखा, ओझा, बाबा, ज्योतिष आदि जो खुद को महात्मा घोषित किये हुए होते हैं, संसार के लोगों को मूर्ख बना ठगने में लगे रहते हैं । और इनके पीछे मूर्खों की लाइन लगी रहती है । जिसमें सामान्य जनता से लेकर प्रोफेसर, अधिकारी, उच्च अधिकारी, नेता, मंत्री, आचार्य, वेदाचार्य आदि सब भेड़ बने गड्ढे में गिरते हैं । कर दो हल्ला कि अमुक गांव में , वन में, पेड़ के नीचे कोई देवी निकली है, देवता निकला है तोह देखते ही देखते वहां मूर्खों की भीड़ पहुँचने लगेगी और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए अपना तन मन धन समर्पण करने लगेगी । अमुक ...